August 24, 2012

कि लो बरसे हैं बादल

कि लो बरसे हैं बादल आज जमकर यूँ दरीचे से
जहाँ तक देख सकते हैं नज़र आबाद होती है|
घरों में लोग कहते हैं अजब है लुत्फ़ बारिश का,
उन्हें मालूम क्या झुग्गी मेरी बर्बाद होती है||
(...जारी है| )

June 13, 2012

बच्चों के बचपन की नाव


बच्चों के बचपन की नाव
खड़ी मझधारे में...

सड़क किनारे ढाबों में,
बर्तन के संग सपने धोता|
बाल दिवस के मौके जो,
आजादी का बोझ है ढोता|
जग तिलिस्म का सिरा खोजता
इस अंधियारे में...

खेल-खिलौने की बेला में,
संग पिता खेतों को जाता|
बस्ते कंधे रखने की,
उम्र में घर का बोझ उठाता|
कई पीढियां उलझी झुलसी
मिट्टी-गारे में...|

(विश्व बाल श्रम निरोधक दिवस-१२ जून पर विशेष)

April 11, 2012

ग़ालिब तेरे शहर में अब वो बात नहीं है

अब लगभग दिल्ली को देखते समझते ४ साल हो गए हैं| शहर पहले से बहुत बदल गया है -लोगों ने ठहरना बंद कर दिया है|  ये वही भागता हुआ शहर जहाँ कभी ग़ालिब की नज्में सुकून की आहट देती थीं| यहाँ की ९५ फीसदी आबादी के बारे में मैंने कुछ यूँ लिखा है -


ग़ालिब तेरे शहर में अब वो बात नहीं है,
आठों पहर है दिन कोई रात नहीं है|
कहने को साथ-साथ हैं एक छत के साये में,
कब बात की थी आखिरी कुछ याद नहीं है|
पत्थर तो हमेशा से बेदर्द रहे हैं,
यहाँ तो दिलों में भी दिल वाली बात नहीं है|
था वक्त एक जब गम में लोग साथ होते थे,
आज जश्न में भी अपनों का साथ नहीं है|
अब तो पर्दों में तक्सीम है ये ज़माना,
सरेशाम नुक्कडी जमघट का कोई रिवाज़ नहीं है|

March 20, 2012



रोज बुनता हूँ सपने खूबसूरत आशियाने के,
बढ़ी इस ब्याज-दर पर घर कहीं बनवा नहीं सकता|

कभी गाहे-बगाहे भूँख का क्या लग ही आती है,
मगर महंगाई में कुछ पेट भर भी खा नहीं सकता|

बने हैं खास जाने कितने ही मेरे इन वोटों से,
मगर उन खास तक आवाज़ भी पहुंचा नहीं सकता|

मुकुराते हैं कई चेहरे मुझे यूँ देखकर,
इसलिए ये दर्द-ऐ-गम रोया भी जा नहीं सकता|

टूटा हूँ इस कदर कि अब बस मौत की खाव्हिश मुझे,
मगर इस हाल में कफ़न का खर्च भी उठा नहीं सकता|


March 10, 2012

Gujarat: Riots are a decade old now


Today Gujarat is one of the most discussed state in our country. However the situation was not always likewise but initiation of 21st century brings it on national board of discussion. That’s something what We can say about Gujarat CM narendra Modi also.  Narendra damodardas modi often remains in spotlight for his various undertakings. Topics of his discussions are widely expressed as paradox but being infamous isn’t that easy.

As in 2002, a bogie of Sabarmati Express near Godhra Railway station had been burnt and due to result of that event communal riots took place in Ahmadabad. Nearly 2000 people died in this tragic sequence. Role of Narendra modi over the riots is always being questionable. As being the chief minister of the state, preventing violence was his primary responsibility but due to poor administration state govt failed to stop the riots and thousands of people lost their lives.

Recently Gujarat experienced 10th anniversary of 2002 riots. In this context, I got chance to go through lots of special reports and articles. The wounds of those riots are still green in the heart of people who suffered that tragic event. The pain of watching their dear ones dying is still alive somewhere in deep. No one can feel that pain – neither me nor anyone else. Few socialists and politicians claim to feel them and use to raise their voices but they are just pushing up their own matters.

Narendra modi can be considered guilty for mismanagement of those riots, as he’s the chief of the state but accusing him as the promoter of the event is nothing more than a political stunt. But I personally think that if Narendra modi is guilty for the riots then he’s also culpable for Godhra tragedy.  Whatever talks go on about 2002 it had to happen. If there would be a muslim chief minister in place of Narendra modi then he had to face the arrogance of carrying out Godhra incident. Overall it’s a part of a political initiative that wants to keep alive the word like riots for self-interest.

Except 2002 incident, the Gujarat has successfully established the governance and development issues in Indian politics. Today state’s growth rate has reached over  10 percent which explains the story of golden Gujarat itself. State remains leading choice of entrepreneurs around the world for making investments. Today, when all states of the country grappling with the problem of power and water, Gujarat is creating huge surplus.

As 10 years have passed to that incident but Media and Politicians are still treating it as a breaking one. Modi also face time to time criticism for those riots. However he has not been charged in this case so far but it’s the time when news is created, Media is moving ahead of the system. Well 2002 was not the first chance when riots broke out in the state. There is a long standing history of riots in Gujarat. Before this Gujarat have already been experienced the riots in  1969, 1971, 1972, 1973, January 1982, March 1984, March-July 1985, January 1986, March 1986, January 1987, April 1990, October 1990, November 1990, December 1990, January, 1991, March 1991, April 1991, January 1992, July 1992, December 1992 and January 1993. In many of these occasions there was a congress government but never got that  political flavor as in 2002.

With all this there’s another aspect, no more violence took place in the state since 2002. The state has grown rapidly on the road of development. The Gujarat has made its different mark across the globe. Narendra Modi is also responsible for all this. The community carries half-filled glass like negative attitude is not ready to look beyond those riots. They are still in this effort to keep 2002 tragedy alive in people’s mind. Media has projected the sequence in a way like there’s nothing beyond that; like that was only communal violence happened  in the country. Now its time to get out of negativity and concentrate on our present. Its better to celebrate independence rather than crying for old times of slavery.





आज की तारीख में गुजरात देश के सर्वाधिक चर्चा में रहने वाले राज्यों में से एक है| हालाँकि हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे लेकिन २१वीं सदी के प्रारम्भ से ये राष्ट्रीय पटल पर ऐसा छाया कि आज भी चर्चा के केंद्र में बना रहता है| ऐसा ही कुछ यहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में भी कह सकते हैं| नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भी अक्सर चर्चा में बने ही रहते हैं| उनकी चर्चाओं के विषयों में विरोधाभाष ज़रूर रहता है लेकिन बदनाम होना भी तो कोई आसान काम नहीं|

गौरतलब है कि २००२ में गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के निकट साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी जला दी गयी थी और उस घटना के फलस्वरूप अहमदाबाद में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे| इस दुखद घटनाक्रम में तकरीबन २००० लोगों की मृत्यु हो गयी थी| उन दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी की भूमिका हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है| उस राज्य का मुख्यमंत्री होने के नाते उन दंगों को रोकना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी थी लेकिन प्रशासन की कमजोरी के चलते राज्य सरकार उन दंगों को रोकने में नाकाम रही और हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा|

हाल ही में गजरात ने २००२ के दंगों की दसवीं बरसी मनाई| इस समबन्ध में कई विशेष रिपोर्ट देखने और पढ़ने को मिली| उन दंगों के ज़ख्म आज भी उसे झेलने वालों के दिल में हरे-भरे हैं| अपनों को मरते हुए देखने का दर्द ज़ेहन में कहीं अब भी जिंदा है| उस दर्द को ना तो मैं महसूस कर सकता हूँ और ना कोई और| कुछ सामाजिक संगठन और राजनेता उस दर्द को आवाज़ देने का काम ज़रूर करते हैं मगर जो लोग उसे महसूस करने का दावा कर रहे हैं दरअसल वो अपनी ही रोटियां सेक रहे हैं|

एक मुख्यमंत्री होने के नाते तो नरेन्द्र मोदी को को दोषी माना जा सकता है लेकिन उन दंगों को हवा देने का आरोप महज एक राजनीतिक स्टंट है और कुछ नहीं| मैं समझता हूँ यदि नरेन्द्र मोदी उन दंगों के लिए दोषी हैं तो उन्हें गोधरा कांड के लिए भी दोषी माना जाना चाहिए| २००२ के दंगों को लेकर जो भी बातें चलती रहती हैं वो तो होनी ही थी| अगर नरेन्द्र मोदी की जगह कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री होता तो उसे गोधरा कांड को अंजाम देने का दंभ झेलना पड़ता| ये बड़ी राजनीतिक पहल का एक हिस्सा है जो राज्य में अपने स्वार्थ के लिए दंगे जैसे शब्द को जिंदा रखना चाहता है|

इन दंगों को छोड़ दे तो १० सालों में गुजरात ने सुशासन और विकास जैसे मुद्दों को भारत की राजनीति में स्थापित करने का काम किया है| आज राज्य की विकास दर १० प्रतिशत के ऊपर पहुँच चुकी है जो स्वर्णिम गुजरात की कहानी खुद बयान करती है| राज्य दुनिया भर के उद्यमियों के लिए के लिए निवेश की प्रमुख पसंद बना हुआ है| आज जब की देश के सारे राज्य बिजली और पानी की समस्या से जूझ रहे हैं,गुजरात अतिरिक्त आपूर्ति की मिसाल कायम कर रहा है|

यूँ तो उन दंगों को १० साल बीत चुके हैं लेकिन मीडिया और राजनीति के गलियारों में वो दंगे कल की बात लगते हैं| समय समय पर मोदी उन दंगों के लिए आलोचना भी झेलते रहते हैं| हालाँकि उन पर अब तक किसी भी प्रकार का आरोप साबित नहीं हुआ है लेकिन आज के दौर में जब कि ख़बरें सिर्फ दिखाई नहीं बल्कि बनाई भी जाती हैं, मीडिया कानून से दो कदम आगे चलते उनको दोषी मानने लगा है| वैसे २००२ वो पहला मौका नहीं था जब राज्य में दंगे हुए थे| गुजरात में दंगों का बहुत पुराना इतिहास रहा है| इससे पहले भी प्रदेश में 1969, 1971, 1972, 1973, जनवरी 1982, मार्च 1984, मार्च से जुलाई 1985, जनवरी 1986, मार्च 1986, जनवरी 1987, अप्रैल 1990, अक्टूबर 1990, नवंबर 1990, दिसंबर 1990, जनवरी 1991, मार्च 1991, अप्रैल 1991, जनवरी 1992, जुलाई 1992, दिसंबर 1992, जनवरी 1993 में दंगे हो चुके हैं| इनमे से कई मौकों पर कांग्रेस की सरकार भी रही पर विरोधियों ने उन्हें वैसा राजनीतिक रंग कभी नहीं दिया जैसा २००२ में हुआ|

इन सब के साथ एक पक्ष ये भी है कि २००२ के बाद से राज्य में दंगे नहीं हुए| राज्य प्रगति की राह पर तेजी से आगे बढ़ा है| आज विश्व में गजरात ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है| इन सब के लिए भी नरेन्द्र मोदी ही जिम्मेदार हैं| लेकिन हमेशा आधा खाली गिलास देखने वाली जमात उन दंगों से आगे देखने को तैयार ही नहीं है| वो आज भी इस कोशिश में है कि कैसे २००२ की त्राश्दी को लोगों के जेहन में जिंदा रखा जाए| मीडिया ने भी दंगों की कुछ ऐसी तस्वीर पेश की है जैसे उन दंगों के आगे जहाँ ही खतम हो गया हो| जैसे कि वो एकमात्र दंगे थे जो देश में हुए| अब समय उस नकारात्मकता के क्रम से बाहर निकलते हुए वर्तमान में जीने का है| परतंत्रता के दिनों को याद करने से बेहतर है कि स्वतंत्रता का जश्न मनाया जाए|

January 24, 2012

रास्ता इधर भी है!!!


समय के साथ लोगों ने विकास को शहरों-महानगरों की तरक्की से जोड़ लिया है| यहाँ रोजाना बनते फ्लाईओवरों, बढ़ते मॉल्स और विकसित होते हवाई-अड्डों को ही विकास की परिभाषा मान लिया गया है| हो सकता है आपको भी ४ लेन की सड़कों में देश आगे बढ़ता हुआ दिखता होगा मगर सच्चाई की पड़ताल के लिए उन क्षेत्रों का रुख करना ही होगा जहाँ की पगडंडियाँ आज भी कच्ची ही सही, एक अदद सड़क के इंतजार में हैं| देश में कुछ हाथ ऐसे भी हैं जो कितनी भी जी तोड़ मेहनत कर लें,बमुश्किल दो वक्त की रोटी ही जुटा पाते हैं| ऐसे माहौल में मेरा ये अनुभव कुछ उम्मीद की किरण जगाता है...| 

पिछले दिनों देश के मध्य क्षेत्र जिसे विन्ध्य क्षेत्र भी कहते हैं, के कुछ भागों का दौरा करने का मौका लगा| इस बेल्ट की अधिकांश सीमा मध्य प्रदेश के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है| ऊँची-लंबी पर्वत श्रेणियाँ किसी हिल-स्टेशन का अहसास जरूर कराती हैं मगर असल में ये क्षेत्र बिलकुल विपरीत हैं| ये भूभाग उतने ही गर्म होते हैं जितने कि हिमालय के पहाड़ी क्षेत्र ठन्डे| यहाँ भूस्खलन से ज्यादा अवैध खनन से खतरा मालूम पड़ता है| जनसंख्या का घनत्व असमान होने की वजह से ये इलाका कभी-कभी निर्जन सा प्रतीत होता है| इन क्षेत्रों में एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता है तो दूसरी तरफ भौतिक संसाधनों का आभाव है| राज्यों की सीमा बदलने के साथ वहाँ के ज़मीनी हालात में आने वाले फर्क को साफ़ महसूस किया जा सकता है|

उत्तर प्रदेश की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है| यहाँ बिना आये ही बहुत सारे लोग प्रदेश की हकीकत का बड़ा सटीक अंदाज़ा लगा लेते हैं| ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली की राजनीति का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है| कुछ लोगों को इसमें ही बड़ा फक्र महसूस होता है मगर क्या रास्तों को भी आबाद होते देखा है कभी| रास्ते ता-उम्र रास्ते ही रह जाते हैं कभी मंजिल नहीं बनते| लोग उनसे गुजरने के बाद उन्हें भूल जाते हैं| और शायद प्रदेश के इस हस्र की वजह भी यही है| यहाँ पार्कों-स्मारकों और उनमे रखे बुतों से ही सियासतदानों को फुर्सत नहीं मिलती, जो सूबे की जिन्दा लाशों पे गौर कर सकें| इसलिए मैं भी भैंस के आगे बीन बजाने में अपना वक्त जाया नहीं करूँगा| पांच सालों का वक्त सरकार वैसे ही जाया कर चुकी है तो मेरा अब और बर्बाद करने का न कोई तुक बनता है और न अधिकार|

सफर में आगे बढ़ने पर हालात कुछ बदलने लगे| प्रदेश के बारे में मेरी तथाकथित राय गलत साबित हो ही रही थी कि एक बोर्ड दिखा ‘ वन विभाग, मध्य प्रदेश की सीमा में आपका स्वागत है’| स्वप्न के दाब से भरे गुबार उड़ने के बजाय फूटने लगे थे| सीमा में आगे बढ़ने पर अपने प्रदेश को लेकर हीनता का अहसास और प्रबल होने लगा था| हालाँकि लोग वैसे ही थे –दीन, हीन, दो रोटी के लिये जी तोड़ मशक्कत करते हुए| राज्यों की सीमायें बदलना या सरकारें बदलना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता और हो भी क्यों – आसमान में बनने वाले इन्द्रधनुष का भी ज़मीन पर कोई अस्तित्व होता है भला! सूबों में तकसीम करने से अगर लोगों की जिंदगी बदलने लगती तो आज पाकिस्तान की हालत शायद ऐसी न होती|

सड़कों की तस्वीर अचानक बदल गयी थीं| हॉट मिक्स तकनीकि से बनी २ लेन की बेहतरीन सड़क छोटे-छोटे कस्बों को राज्य के महानगरों से जोड़ रही थी| मालूम करने पर पता चला कि ऐसी वो अकेली सड़क नहीं थी वहाँ| ऐसी अच्छी गुणवत्ता(क्वालिटी) वाली सड़कों के निर्माण के लिए मध्य प्रदेश राज्य सड़क विकास निगम कि स्थापना की गयी है| बहुत ही कम ऐसे राज्य हैं जहाँ सड़कों के विकास के लिए समर्पित विभाग की स्थापना की गयी है और मध्य प्रदेश भी उनमे से एक है|इस पहल का असर भी साफ़ महसूस किया जा सकता है| वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय राजमार्गों की हालत उतनी ही खराब है| राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या ७ (वाराणसी से कन्याकुमारी) जो कि देश का सबसे लंबा राजमार्ग है, अफ़सोस शायद यात्रा के लिए सबसे घटिया है| जब उस सड़क पर पहुंचा तो लगा कि देश के सबसे बड़े राजमार्ग पर चलना मेरे लिये किसी गर्व से कम नहीं होगा मगर सफर के अंत तक बस एक ही ख्याल आ रहा था कि जल्दी से ये सड़क खत्म हो जाये| केंद्र की एक और ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ का हस्र भी प्रदेश में कुछ ऐसा ही है| एक समय में लोगों की तारीफों के केंद्र में रही ये योजना भी राज्य में अपना दम तोडती नजर आई|आकडों के मुताबिक वित्तीय प्रबंधन के आभाव में केंद्र सरकार पिछले कुछ सालों में राज्य को कोई भी भी बजट आवंटित करने में नाकाम रही है| कहीं केंद्र और राज्य सरकारों की इस खींचतान में जनता सड़कों से महरूम न रह जाये!

कारवाँ बढ़ा तो कुछ ऐसा देखा जो पहले कभी नहीं देखा था और शायद आप में से किसी ने नहीं देखा होगा| एक बेहद छोटे कस्बे में GVK प्रायोजित एक एम्बुलेंस खड़ी थी| उस अत्यधिक आधुनिक एम्बुलेंस के साथ एक नर्सिंग स्टाफ भी था जो प्राथमिक उपचार के साथ-साथ चुनिन्दा इमरजेंसी सेवायें देने में भी सक्षम था| मुझे लगा शायद कहीं बाहर से आई होगी किसी तत्काल सेवा के लिए| लेकिन पड़ताल के बाद ये ज्ञात हुआ कि वो एम्बुलेंस उसी कस्बे की है जो आसपास के इलाकों में सेवायें देती है| ये पहल मध्य प्रदेश सरकार और जीवीके का साझा उपक्रम है जो पूरे प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य देने के लिए प्रारंभ की गयी है| साथ ही दूरांत इलाकों में भी ४० किलोमीटर के अंदर एक एम्बुलेंस सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है जो १०८ डायल करते ही यथाशीघ्र आपकी सेवा में हाजिर हो जाती है| प्रदेश में जननी एक्सप्रेस नाम की एक और एम्बुलेंस सेवा ग्रामीण इलाकों में चालू की गयी है जो सिर्फ गर्भवती महिलाओं को सेवा उपलब्ध कराती है| ये जननी एक्सप्रेस उस महिला को नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाती है| ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर के आकडों के नियंत्रण के लिए ऐसी और योजनाओं की आवश्यकता है|

मैंने ये सब यहाँ इसलिए नहीं लिखा है कि मैं सरकार का PRO हूँ| इन सब बातों का इक दिलचस्प पहलू ये है कि सारी सेवायें निःशुल्क उपलब्ध हैं| यहीं नहीं गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव कराने पर 1500 रुपये भी दिए जाते जाते हैं| पहली नजर में ये सब सरकारी खजाने को लुटाने का मामला लगता है| जिस राजस्व को इतने प्रयासों के बाद सरकार तक पहुँचाया जाता है उसे महज एक डिलीवरी के नाम पर बांटना सरासर दुर्पुयोग समझ आता है| लेकिन आमतौर में सक्षम लोग सरकारी एम्बुलेंस और सरकारी सेवाओं का इंतजार नहीं करते| उन्हें ऐसी स्थिति में चार दिन पहले ही प्राइवेट अस्पतालों में दाखिल करा दिया जाता है| तो इन मुफ्त स्वस्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वाले लोगों की तादाद भी बहुत ज्यादा नहीं है| और फिर जब किसी एक घोटाले में एक नेता अकेले डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की हेरा फेरी कर सकता है| तो इतनी बड़ी तादाद में जनता को दी जाने वाली इस सुविधा के लिए सरकारी राजस्व का उपयोग मेरी समझ में बिल्कुल गलत नहीं है| अनुमानतः इस योजना का खर्च भी उस २जी घोटाले के चमत्कारी आकडे को नहीं छूता होगा|

इस बात में मुझे कोई संशय नहीं कि ये सब वोटर्स को लुभाने का प्रयास है| लेकिन साथ ही ये भी सच है कि उन क्षेत्रों में रहने वालों की जिंदगी इन पहलों से बेहतर हुई है| मतदाता तुष्टिकरण के लिए ही सही लेकिन अगर सरकार ऐसी कोई योजना किसी भी राज्य में लेकर आती है तो उसका स्वागत होना चाहिए लेकिन सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के दायरे में| और बुनियादी सुविधाओं की परिधि में मुफ्त लैपटॉप ,टैब्स और मुफ्त बिजली नहीं आते !!!

January 19, 2012

महफ़िल-ए-राजनीति: मधुबाला बनाम नटवरलाल

ये मेरा रेखापर(ऑनलाइन) पहला राजनीतिक वयंग्य है| इसकी लम्बाई से थोडा समझौता किया गया है क्यूंकि महंगाई से जूझते देश पर इससे अधिक बोझ डालना उचित नही| उम्मीद है आपको पसंद नहीं आएगा और विश्वास है कि आप नाक-भौंह सिकोड़ने में कोई कसर नहीं छोडेंगे| सफर के आगाज़ में ही राहुल आँधी के प्रसंशको से अनुरोध है कि वो यहीं से वापस लौट जाएँ अन्यथा भावनाओं के हताहत होने की जिम्मेदार सवारी खुद होगी|

हाल ही में एक सिनेमा आया था, नाममेरे ब्रदर की दुल्हन ,शायद याद हो | फिल्म का हस्र उत्तर प्रदेश की पोलिटिक्स से भी बुरा हुआ मगर उसका एक डायलाग यहाँ भूचाल लाने के लिए काफी था | हीरो ने कहा "यूपी आये और ढोल नहीं बजा तो क्या खाक यूपी आये " और राहुल बाबा ने ये बात दिल पे ले ली | पिछले कुछ सालों से राहुल आंधी के उत्तर प्रदेश दौरे उनकी सरकार के घोटालों की तरह रोज़ की बात हो गए हैं , मगर उनके आने-जाने से उनकी पार्टी की सेहत पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है | एक दिन विचार करने पर उन्हें समझ आया कि शायद 'ढोल' में कमी रह गयी होगी| खैर इच्छा के मुताबिक इस बार उनके आगमन पर एक शानदार जलसे का आयोजन हुआ, सारे बड़ी नाक वाले लोग आमंत्रित थे, या यूँ कहिये सारे गरीबों के ठेकेदार समारोह की शोभा बढ़ा रहे थे| साथ ही साथ ढोल का इन्तेजाम भी था, यही नहीं उनके चापलूस कार्यकर्ताओं ने दो कदम आगे बढ़कर काम किया | ढोल तक तो सब ठीक था मगर बवाल तब मचा जब मधुबाला भी साथ में नाची| हालाँकि गरीबों के वकीलों ने जमकर लुत्फ़ उठाया पर नियम के मुताबिक विपक्षी पार्टियों को ये बात नागवार गुजरी | खूब बवाल मचा - खुलकर बयानबाज़ी हुई| एक सज्जन ने तो मर्यादा का हवाला देते हुए जनहित याचिका भी दे मारी | जब इस बाबत कोर्ट ने युवराज को तलब किया तो उन्होंने इसे पार्टी का प्रचार करार दिया | अब वो प्रचार ढोल का था या मधुबाला का इस राज़ पर युवराज कुंडली मार के बैठे हैं |

इस बीच राहुल बाबा प्रेस के हत्थे भी चढ़े लेकिन मजाल कि उनके मुंह से कोई सच उगलवा ले | कुछ पत्रकार विदेशी निवेश के मुद्दे पर भी घेरने की कोशिश में थे मगर दिग्गी राजा की ज़बरदस्त फील्डिंग की वजह से उन्हें कैच नहीं किया जा सका | उसी पत्रकार सम्मलेन में लगे हाथ बाबा आँधी ने इस घटना की सीबीआई जांच की मांग भी कर डाली |अब बताइए सीबीआई मधुबालाओं की जांच करे कि नटवरलालों को पकड़े | और फिर सीबीआई में इतनी दम कहा कि आज के युवराज और कल के महाराज पर हाथ डाल सके | जाते-जाते अंत में राहुल ने अपना दर्द बयां कर ही डाला “जब आईपीएल में चीयर गर्ल्स हो सकती हैं तो राजनीती में क्यूँ नहीं” ?

ढोल बजते जा रहे हैं | मधुबाला राजनीतिक दंगलों की शोभा बढ़ा रही है |विरोधियों के हायतौबा-गान अब भी जारी हैं| जनहित याचिका पर अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है – दिल्ली,लखनऊ और फैजाबाद की अदालतों जितना सुरक्षित| देश आगे बढ़ रहा है..........!!!

(ये व्यंग्य अर्धकल्पनिक है, अर्थात इस कहानी के सभी पात्र तो वास्तविक हैं पर इसके विपरीत कहानी वास्तविकता से उतनी ही दूर है जितनी गरीबों से गरीब रथ!)

January 12, 2012

Road To Shining India


We are the part of a corrupt system right from our birth. It doesn't matter, we are actively involved or suffering at the passive end but the important point is- we are the part of a corrupt system. Now when we actually come in touch with then we realize that there's something illegal going on.

In our society, everyone is having his own definition for corruption. In general, if we are getting 500 bucks from somewhere as bribe then its our service charge which we are getting for our outstanding services but if we have to give the same 500 bucks to someone else then 'corruption' comes in existence. Now corruption has become the part of our culture. In our system one becomes corrupt by the very first day of his service. It doesn't matter he is doing that for himself or for someone else who's senior to him; either at departmental end or at political end.

We - the very basic element of our society, are the root cause of this corruption. We are helping it to expand its ways; whether it is directly or indirectly. Our double standards for this term are making it more dangerous for any system irrespective of the applicable area. We - the innocent folks of the country thinks that arranging a berth in a train by paying some money to T.T.E. is not that corruption, we are talking about. Or saving fine against few bucks, from a traffic constable is not illegal. How could we blame everyone including that T.T.E. and traffic constable for all this.

Most of my generation wants to join Government organizations or Public sector. That's not because they are keen interested to work for these organisations, but the goal is to ensure a healthy and wealthy life there. They all know just two things about these sectors - One is huge money and - second 'for nothing'. In some departments, a third factor is also involved- Bonus, that comes under the table. That's all that young generation wants for their lives and we use to say "We are YOUTH AGAINST CORRUPTION". Are we really against it?

Everyone here wants to clean the mess but we really have no idea how to get out of all this. Recently, Anna's movement against corruption excited the country on the whole issue and attracted huge crowd & support for the cause. I also agree with Anna Hazare and support his janlokpal movement but there's a parallel thought also involved- first we have to change ourselves otherwise no lokpal is going to help us. On the whole, we are both in this case- victim as well as the guilty. For one instance we stand against corruption as a victim of this corrupt system and at very next moment trigger turns its way and we become the guilty for the same.

If we really want to change the scenario then still there are chances to grow up with a bang and achieve the MISSION 2020. Youth carries all that energy, potential & power; that a country needs in its journey from better to become best. Now its time to think of your future and involvement in country's progress. No question, its an brilliant idea to appoint lokpal in order to make India corruption free but no lokpal can change our mentality; he can not do anything for those habits of getting berth on payment of some extra bucks or 100 bucks for breaking traffic signal. So There is much more to do beyond this lokpal bill. There are number of ideas that should be implemented along with this lokpal in order to achieve our mission of shining India.

One of the best way's to stop this corruption flood is - state sponsored elections. It'll help in preventing extra expenses in elections done by a candidate; which he uses to recover later from public funds illegally. Second is, availing the Right to reject option to voters in polls. On the basis of this, the candidates could be disqualified as per their higher number of rejections. Introducing the transparent technologies, formation of citizen charter will also be helpful. Finally, we the very own and respected citizens of India can change the situation and contribute our best in the making of a better India.

Welcome Note


Welcome to my latest blog. This blog is realtime reflection of my feelings that I will share with you here very soon. Well, I had my first experience with this edition of internet four years ago but in this span I have not written a single word here. Now I am back on this blog with great because a stupid is always expected to come back by the time. It is possible that in the past I have made some mental progress. As well as it is also possible that my thinking has become worse just like our country. I would love to hear your views in this regard. With English, this time I have decided to share in our national language – Hindi as well. Although its not possible to express every article or piece in two versions simultaneously but still I will try my best to publish max of them in both. I’ll be waiting for your response on every sharing.
With Best Wishes...

मेरे इस ताजातरीन ब्लॉग में आपका स्वागत है| ये ब्लॉग मेरी सवेदानाओं का प्रतिबिम्ब है जिन्हें मैं समय-दर-समय आपके साथ साझा करूँगा| यूँ तो मैं चार साल पहले भी इन्टरनेट के इस संस्करण में हाथ आजमा चुका हूँ लेकिन इन चार सालों में एक फूटा शब्द भी मेरे दिमाग में नहीं उपजा है| खैर बड़ी उमीदों के साथ फिर से यहाँ का रुख किया है क्यूँकि हमेशा से लौट के बुद्धू घर को आते रहे हैं| संभव है कि बीते समय में मेरी मानसिक गतिविधियों में कुछ तरक्की हुई हो, साथ ही साथ ये भी संभव है की देश की तरह मेरी सोच भी दुर्गति की राह पर बढ़ चली हो| इस सम्बन्ध में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा| इस बार अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में रूबरु होने का मन बनाया है| ये संभव नहीं है कि हर लेख को दोनों भाषाओं में लिखा जाये फिर भी कोशिश रहेगी कि दोनों भाषाओँ में उसे यहाँ प्रकाशित किया जाये| किसी भी लेख के लिए आपकी प्रतिकिया का इंतज़ार रहेगा|
शुभकामनाओं सहित|