रोज बुनता हूँ सपने खूबसूरत आशियाने के,
बढ़ी इस ब्याज-दर पर घर कहीं बनवा नहीं सकता|
कभी गाहे-बगाहे भूँख का क्या लग ही आती है,
मगर महंगाई में कुछ पेट भर भी खा नहीं सकता|
बने हैं खास जाने कितने ही मेरे इन वोटों से,
मगर उन खास तक आवाज़ भी पहुंचा नहीं सकता|
मुकुराते हैं कई चेहरे मुझे यूँ देखकर,
इसलिए ये दर्द-ऐ-गम रोया भी जा नहीं सकता|
टूटा हूँ इस कदर कि अब बस मौत की खाव्हिश मुझे,
मगर इस हाल में कफ़न का खर्च भी उठा नहीं सकता|
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