January 24, 2012

रास्ता इधर भी है!!!


समय के साथ लोगों ने विकास को शहरों-महानगरों की तरक्की से जोड़ लिया है| यहाँ रोजाना बनते फ्लाईओवरों, बढ़ते मॉल्स और विकसित होते हवाई-अड्डों को ही विकास की परिभाषा मान लिया गया है| हो सकता है आपको भी ४ लेन की सड़कों में देश आगे बढ़ता हुआ दिखता होगा मगर सच्चाई की पड़ताल के लिए उन क्षेत्रों का रुख करना ही होगा जहाँ की पगडंडियाँ आज भी कच्ची ही सही, एक अदद सड़क के इंतजार में हैं| देश में कुछ हाथ ऐसे भी हैं जो कितनी भी जी तोड़ मेहनत कर लें,बमुश्किल दो वक्त की रोटी ही जुटा पाते हैं| ऐसे माहौल में मेरा ये अनुभव कुछ उम्मीद की किरण जगाता है...| 

पिछले दिनों देश के मध्य क्षेत्र जिसे विन्ध्य क्षेत्र भी कहते हैं, के कुछ भागों का दौरा करने का मौका लगा| इस बेल्ट की अधिकांश सीमा मध्य प्रदेश के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है| ऊँची-लंबी पर्वत श्रेणियाँ किसी हिल-स्टेशन का अहसास जरूर कराती हैं मगर असल में ये क्षेत्र बिलकुल विपरीत हैं| ये भूभाग उतने ही गर्म होते हैं जितने कि हिमालय के पहाड़ी क्षेत्र ठन्डे| यहाँ भूस्खलन से ज्यादा अवैध खनन से खतरा मालूम पड़ता है| जनसंख्या का घनत्व असमान होने की वजह से ये इलाका कभी-कभी निर्जन सा प्रतीत होता है| इन क्षेत्रों में एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता है तो दूसरी तरफ भौतिक संसाधनों का आभाव है| राज्यों की सीमा बदलने के साथ वहाँ के ज़मीनी हालात में आने वाले फर्क को साफ़ महसूस किया जा सकता है|

उत्तर प्रदेश की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है| यहाँ बिना आये ही बहुत सारे लोग प्रदेश की हकीकत का बड़ा सटीक अंदाज़ा लगा लेते हैं| ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली की राजनीति का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है| कुछ लोगों को इसमें ही बड़ा फक्र महसूस होता है मगर क्या रास्तों को भी आबाद होते देखा है कभी| रास्ते ता-उम्र रास्ते ही रह जाते हैं कभी मंजिल नहीं बनते| लोग उनसे गुजरने के बाद उन्हें भूल जाते हैं| और शायद प्रदेश के इस हस्र की वजह भी यही है| यहाँ पार्कों-स्मारकों और उनमे रखे बुतों से ही सियासतदानों को फुर्सत नहीं मिलती, जो सूबे की जिन्दा लाशों पे गौर कर सकें| इसलिए मैं भी भैंस के आगे बीन बजाने में अपना वक्त जाया नहीं करूँगा| पांच सालों का वक्त सरकार वैसे ही जाया कर चुकी है तो मेरा अब और बर्बाद करने का न कोई तुक बनता है और न अधिकार|

सफर में आगे बढ़ने पर हालात कुछ बदलने लगे| प्रदेश के बारे में मेरी तथाकथित राय गलत साबित हो ही रही थी कि एक बोर्ड दिखा ‘ वन विभाग, मध्य प्रदेश की सीमा में आपका स्वागत है’| स्वप्न के दाब से भरे गुबार उड़ने के बजाय फूटने लगे थे| सीमा में आगे बढ़ने पर अपने प्रदेश को लेकर हीनता का अहसास और प्रबल होने लगा था| हालाँकि लोग वैसे ही थे –दीन, हीन, दो रोटी के लिये जी तोड़ मशक्कत करते हुए| राज्यों की सीमायें बदलना या सरकारें बदलना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता और हो भी क्यों – आसमान में बनने वाले इन्द्रधनुष का भी ज़मीन पर कोई अस्तित्व होता है भला! सूबों में तकसीम करने से अगर लोगों की जिंदगी बदलने लगती तो आज पाकिस्तान की हालत शायद ऐसी न होती|

सड़कों की तस्वीर अचानक बदल गयी थीं| हॉट मिक्स तकनीकि से बनी २ लेन की बेहतरीन सड़क छोटे-छोटे कस्बों को राज्य के महानगरों से जोड़ रही थी| मालूम करने पर पता चला कि ऐसी वो अकेली सड़क नहीं थी वहाँ| ऐसी अच्छी गुणवत्ता(क्वालिटी) वाली सड़कों के निर्माण के लिए मध्य प्रदेश राज्य सड़क विकास निगम कि स्थापना की गयी है| बहुत ही कम ऐसे राज्य हैं जहाँ सड़कों के विकास के लिए समर्पित विभाग की स्थापना की गयी है और मध्य प्रदेश भी उनमे से एक है|इस पहल का असर भी साफ़ महसूस किया जा सकता है| वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय राजमार्गों की हालत उतनी ही खराब है| राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या ७ (वाराणसी से कन्याकुमारी) जो कि देश का सबसे लंबा राजमार्ग है, अफ़सोस शायद यात्रा के लिए सबसे घटिया है| जब उस सड़क पर पहुंचा तो लगा कि देश के सबसे बड़े राजमार्ग पर चलना मेरे लिये किसी गर्व से कम नहीं होगा मगर सफर के अंत तक बस एक ही ख्याल आ रहा था कि जल्दी से ये सड़क खत्म हो जाये| केंद्र की एक और ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ का हस्र भी प्रदेश में कुछ ऐसा ही है| एक समय में लोगों की तारीफों के केंद्र में रही ये योजना भी राज्य में अपना दम तोडती नजर आई|आकडों के मुताबिक वित्तीय प्रबंधन के आभाव में केंद्र सरकार पिछले कुछ सालों में राज्य को कोई भी भी बजट आवंटित करने में नाकाम रही है| कहीं केंद्र और राज्य सरकारों की इस खींचतान में जनता सड़कों से महरूम न रह जाये!

कारवाँ बढ़ा तो कुछ ऐसा देखा जो पहले कभी नहीं देखा था और शायद आप में से किसी ने नहीं देखा होगा| एक बेहद छोटे कस्बे में GVK प्रायोजित एक एम्बुलेंस खड़ी थी| उस अत्यधिक आधुनिक एम्बुलेंस के साथ एक नर्सिंग स्टाफ भी था जो प्राथमिक उपचार के साथ-साथ चुनिन्दा इमरजेंसी सेवायें देने में भी सक्षम था| मुझे लगा शायद कहीं बाहर से आई होगी किसी तत्काल सेवा के लिए| लेकिन पड़ताल के बाद ये ज्ञात हुआ कि वो एम्बुलेंस उसी कस्बे की है जो आसपास के इलाकों में सेवायें देती है| ये पहल मध्य प्रदेश सरकार और जीवीके का साझा उपक्रम है जो पूरे प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य देने के लिए प्रारंभ की गयी है| साथ ही दूरांत इलाकों में भी ४० किलोमीटर के अंदर एक एम्बुलेंस सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है जो १०८ डायल करते ही यथाशीघ्र आपकी सेवा में हाजिर हो जाती है| प्रदेश में जननी एक्सप्रेस नाम की एक और एम्बुलेंस सेवा ग्रामीण इलाकों में चालू की गयी है जो सिर्फ गर्भवती महिलाओं को सेवा उपलब्ध कराती है| ये जननी एक्सप्रेस उस महिला को नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाती है| ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर के आकडों के नियंत्रण के लिए ऐसी और योजनाओं की आवश्यकता है|

मैंने ये सब यहाँ इसलिए नहीं लिखा है कि मैं सरकार का PRO हूँ| इन सब बातों का इक दिलचस्प पहलू ये है कि सारी सेवायें निःशुल्क उपलब्ध हैं| यहीं नहीं गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव कराने पर 1500 रुपये भी दिए जाते जाते हैं| पहली नजर में ये सब सरकारी खजाने को लुटाने का मामला लगता है| जिस राजस्व को इतने प्रयासों के बाद सरकार तक पहुँचाया जाता है उसे महज एक डिलीवरी के नाम पर बांटना सरासर दुर्पुयोग समझ आता है| लेकिन आमतौर में सक्षम लोग सरकारी एम्बुलेंस और सरकारी सेवाओं का इंतजार नहीं करते| उन्हें ऐसी स्थिति में चार दिन पहले ही प्राइवेट अस्पतालों में दाखिल करा दिया जाता है| तो इन मुफ्त स्वस्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वाले लोगों की तादाद भी बहुत ज्यादा नहीं है| और फिर जब किसी एक घोटाले में एक नेता अकेले डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की हेरा फेरी कर सकता है| तो इतनी बड़ी तादाद में जनता को दी जाने वाली इस सुविधा के लिए सरकारी राजस्व का उपयोग मेरी समझ में बिल्कुल गलत नहीं है| अनुमानतः इस योजना का खर्च भी उस २जी घोटाले के चमत्कारी आकडे को नहीं छूता होगा|

इस बात में मुझे कोई संशय नहीं कि ये सब वोटर्स को लुभाने का प्रयास है| लेकिन साथ ही ये भी सच है कि उन क्षेत्रों में रहने वालों की जिंदगी इन पहलों से बेहतर हुई है| मतदाता तुष्टिकरण के लिए ही सही लेकिन अगर सरकार ऐसी कोई योजना किसी भी राज्य में लेकर आती है तो उसका स्वागत होना चाहिए लेकिन सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के दायरे में| और बुनियादी सुविधाओं की परिधि में मुफ्त लैपटॉप ,टैब्स और मुफ्त बिजली नहीं आते !!!

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