January 19, 2012

महफ़िल-ए-राजनीति: मधुबाला बनाम नटवरलाल

ये मेरा रेखापर(ऑनलाइन) पहला राजनीतिक वयंग्य है| इसकी लम्बाई से थोडा समझौता किया गया है क्यूंकि महंगाई से जूझते देश पर इससे अधिक बोझ डालना उचित नही| उम्मीद है आपको पसंद नहीं आएगा और विश्वास है कि आप नाक-भौंह सिकोड़ने में कोई कसर नहीं छोडेंगे| सफर के आगाज़ में ही राहुल आँधी के प्रसंशको से अनुरोध है कि वो यहीं से वापस लौट जाएँ अन्यथा भावनाओं के हताहत होने की जिम्मेदार सवारी खुद होगी|

हाल ही में एक सिनेमा आया था, नाममेरे ब्रदर की दुल्हन ,शायद याद हो | फिल्म का हस्र उत्तर प्रदेश की पोलिटिक्स से भी बुरा हुआ मगर उसका एक डायलाग यहाँ भूचाल लाने के लिए काफी था | हीरो ने कहा "यूपी आये और ढोल नहीं बजा तो क्या खाक यूपी आये " और राहुल बाबा ने ये बात दिल पे ले ली | पिछले कुछ सालों से राहुल आंधी के उत्तर प्रदेश दौरे उनकी सरकार के घोटालों की तरह रोज़ की बात हो गए हैं , मगर उनके आने-जाने से उनकी पार्टी की सेहत पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है | एक दिन विचार करने पर उन्हें समझ आया कि शायद 'ढोल' में कमी रह गयी होगी| खैर इच्छा के मुताबिक इस बार उनके आगमन पर एक शानदार जलसे का आयोजन हुआ, सारे बड़ी नाक वाले लोग आमंत्रित थे, या यूँ कहिये सारे गरीबों के ठेकेदार समारोह की शोभा बढ़ा रहे थे| साथ ही साथ ढोल का इन्तेजाम भी था, यही नहीं उनके चापलूस कार्यकर्ताओं ने दो कदम आगे बढ़कर काम किया | ढोल तक तो सब ठीक था मगर बवाल तब मचा जब मधुबाला भी साथ में नाची| हालाँकि गरीबों के वकीलों ने जमकर लुत्फ़ उठाया पर नियम के मुताबिक विपक्षी पार्टियों को ये बात नागवार गुजरी | खूब बवाल मचा - खुलकर बयानबाज़ी हुई| एक सज्जन ने तो मर्यादा का हवाला देते हुए जनहित याचिका भी दे मारी | जब इस बाबत कोर्ट ने युवराज को तलब किया तो उन्होंने इसे पार्टी का प्रचार करार दिया | अब वो प्रचार ढोल का था या मधुबाला का इस राज़ पर युवराज कुंडली मार के बैठे हैं |

इस बीच राहुल बाबा प्रेस के हत्थे भी चढ़े लेकिन मजाल कि उनके मुंह से कोई सच उगलवा ले | कुछ पत्रकार विदेशी निवेश के मुद्दे पर भी घेरने की कोशिश में थे मगर दिग्गी राजा की ज़बरदस्त फील्डिंग की वजह से उन्हें कैच नहीं किया जा सका | उसी पत्रकार सम्मलेन में लगे हाथ बाबा आँधी ने इस घटना की सीबीआई जांच की मांग भी कर डाली |अब बताइए सीबीआई मधुबालाओं की जांच करे कि नटवरलालों को पकड़े | और फिर सीबीआई में इतनी दम कहा कि आज के युवराज और कल के महाराज पर हाथ डाल सके | जाते-जाते अंत में राहुल ने अपना दर्द बयां कर ही डाला “जब आईपीएल में चीयर गर्ल्स हो सकती हैं तो राजनीती में क्यूँ नहीं” ?

ढोल बजते जा रहे हैं | मधुबाला राजनीतिक दंगलों की शोभा बढ़ा रही है |विरोधियों के हायतौबा-गान अब भी जारी हैं| जनहित याचिका पर अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है – दिल्ली,लखनऊ और फैजाबाद की अदालतों जितना सुरक्षित| देश आगे बढ़ रहा है..........!!!

(ये व्यंग्य अर्धकल्पनिक है, अर्थात इस कहानी के सभी पात्र तो वास्तविक हैं पर इसके विपरीत कहानी वास्तविकता से उतनी ही दूर है जितनी गरीबों से गरीब रथ!)

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