February 21, 2013

लो आ गए बजट वाले...


सुना है फिर बजट आ रहा है| साल दर साल संसद में बजट जा रहा है आ रहा है, वित्त मंत्री का पिटारा खुलता जा रहा है राजनीति की चासनी में घुलता जा रहा है| कितने वित्त मंत्री आये गए पर ये बजट संसद में अपनी हाजरी हर वर्ष दर्ज करा रहा है| आमतौर पर वर्ष के फ़रवरी माह में आने वाला बजट अपने आप में आग का गोला होता है शायद यही कारण है कि इस बजट के पारित होते ही मौसम में कुछ गर्मी कि दस्तक महसूस होने लगती है| बजट के आने की सुगबुगाहट होते ही शेयर बाज़ार के दलाल अपनी कमाई के जुगाड़ में लग जाते हैं| 15 दिन पहले से बाज़ारों के उतार-चढ़ाव का खेल चालू हो जाता है, प्रतीत होता है अगले वित्त वर्ष का बजट पिछले साल की कमाई पर भी हाथ साफ़ कर देगा|

यकीन मानिये जब बजट संसद में पढ़ा जाता है तो यूँ लगता है मानो स्वयं भगवान ब्रम्हा तकदीर का लिखा पढकर सुना रहे हों| हर योजना बरसाती इन्द्रधनुष लगती है जो देखने में बेहद आकर्षक नजर आती है पर यथार्थ से उतनी ही परे होती है| सत्ता के गलियारों में उछल-कूद करने वाले सरकार के इस लुभावने स्टंट को भलीभाँति समझते हैं, पर जो टीवी अखबार से चिपकी जनता है उसे हर बजट में उम्मीद ही नजर आती है| उसे राजनीति का ये अखाड़ा अपने जैसा ही मासूम नजर आता है जहाँ वोट के बदले सुनहरे कल की उम्मीद परोसी जाती है और उसे वो सच मान बैठता है|

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कितने काबिल होते हैं ये वित्त-मंत्री – १२० करोड़ आबादी वाली जनता की जरूरतों को ये दिल्ली के एक बंद ए.सी. कमरे में बैठकर ही समझ लेते हैं| और उससे भी अद्भुत होता है वो दृश्य जब आदरणीय वित्त-मंत्री ३६५ दिन के बहीखाते और योजनाओं को दिनभर के कुछ घंटों में पढ़ देते हैं| हज़ार-लाख करोड़ के आँकड़े सुनकर तो मन में मोर नाचने लगते हैं मगर साल बीतते-बीतते, अंत तक न वो नृत्य बचता है न मोर|

भारत बदल रहा है| लोग बदल रहे हैं| बच्चों ने अपने खिलौने बदल दिए हैं, युवा पश्चिम की ओर चल दिए हैं, महिलाओं ने परिधानों का बोझ कम किया है बड़ों ने सुबह-शाम व्हिस्की-रम पिया है| अब तुम भी बदल डालो ये रिवाज़ जो जनता के साथ सरेआम धोखा है| अरे आप लोग साल-भर तो घर के बजट में आग लगते हैं और साल के अंत में ‘देश के बजट’ के नाम पर चुनावी-राग सुनाते हैं| बजट जिसे सामाजिक विषमता को कम करने की व्यवस्था होना चाहिए था वो कॉर्पोरेट हाउसेज के तुष्टीकरण का उत्सव मात्र बनकर रह गया है| अगर वाकई देश की पीड़ा का एहसास है तो इन कागजों के बाहर, आकड़ों से ऊपर कुछ कर के दिखाएँ – ये बजट वाले|

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