ये मेरे कुछ वो शेर हैं जिन्हें पूरी ग़ज़ल नसीब नहीं हुई | हालाँकि गुनाह मेरा है पर आवारगी का इल्जाम इन शेरों के सर आया है....
ये शहर बड़े अन्जान होते हैं |
लोग पत्थरों के सिर्फ काँच के मकान होते हैं |
आज ज्यादा मिल गया कल भूखे सो गए|
ऐसे ही जिंदगी को कई रोज़ हो गए |
वो तेरा ये मेरा कोई हद सी लगती है |
कमरों की दीवारें सरहद जैसी लगतीहै |
वक्त ने सबका हिसाब लिक्खा है |
किसी के हिस्से काँटे किसी के गुलाब लिक्खा है|
कितने राज़ सीने में दफ्न किये जल रहा हूँ मैं
सुबह की उम्मीद में हर शाम ढाल रहा हूँ मैं
यूँ तो ठोकरें खाना पुराना शौक रहा है मगर
सँभालने की कोशिश में रिवाज़ बदल रहा हूँ मैं |
जिस्म का आशियाँ अब भी वही मोहल्ला है |
ज़रा सी बात पे बिफरीं खुशियों ने पता बदला है|
ये शहर बड़े अन्जान होते हैं |
लोग पत्थरों के सिर्फ काँच के मकान होते हैं |
आज ज्यादा मिल गया कल भूखे सो गए|
ऐसे ही जिंदगी को कई रोज़ हो गए |
वो तेरा ये मेरा कोई हद सी लगती है |
कमरों की दीवारें सरहद जैसी लगतीहै |
वक्त ने सबका हिसाब लिक्खा है |
किसी के हिस्से काँटे किसी के गुलाब लिक्खा है|
कितने राज़ सीने में दफ्न किये जल रहा हूँ मैं
सुबह की उम्मीद में हर शाम ढाल रहा हूँ मैं
यूँ तो ठोकरें खाना पुराना शौक रहा है मगर
सँभालने की कोशिश में रिवाज़ बदल रहा हूँ मैं |
जिस्म का आशियाँ अब भी वही मोहल्ला है |
ज़रा सी बात पे बिफरीं खुशियों ने पता बदला है|
vah mere lal ......tune kar diya kamal...
ReplyDeletethank you Shubhanshu :)
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