आवारगी पसंद शेरों की दूसरी किश्त पेश है...पहला शेर नए समाजवाद का अक्स है... धुँधली उम्मीद|
लोक-संस्कृति के दायरे में
शबाब आ गया
यूँ लोहिया के मुल्क में
समाजवाद आ गया|
किसी को सोने नहीं देता
सर्द रात का सन्नाटा
कहीं नशे की बदहवासी में
रात ढलती है|
वो शज़र और थे जो आँधी में
ढह गए
हमने तो झुकने का हुनर सीखा
है|
किताबी शक्ल में छपते हैं
अखबार देखिये
रिश्तों की नीलामी के
इश्तहार देखिये|
जैसी भी है जिंदगी खुदा
तेरी रज़ा मानेंगे
अपनों के वास्ते जीने की
सजा मांगेगे|
मैं हूँ जो जुलूसों में
चला जा रहा हूँ,
मैं ही हूँ जो दंगों में
जला जा रहा हूँ,
अपने घर जला सियासत की
रोटियां सेंकी हैं,
फिर भी हर कदम पर छला जा
रहा हूँ|