December 12, 2013

ये जनादेश कुछ कहता है...

जब 8 दिसम्बर को 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो मीडिया में चल रहे सरकार के सेमीफ़ाइनल को करार आया| नतीजे जहाँ कांग्रेस की अकड़ तोड़ने वाले थे वहीँ भाजपा के दीर्घकालिक एजेंडे को बल देने वाले| ‘आप’ पार्टी का जश्न भी इस बात का गवाह था कि उनके हाथ कुछ बड़ा लगा है| सपा-बसपा की जनाधार बढ़ाने की कोशिशों को आघात लगा है मगर 9 दिसम्बर को मिजोरम फिर कांग्रेस के हाथ लगा है| ज्यादा वोटिंग को सरकार के खिलाफ लहर का संकेत मानने वाले विश्लेषकों को भी निराशा हाथ लगी है|

दिल्ली में ‘आप’ सहित कई जानकार भी ये मान रहे हैं कि ये चुनाव अभूतपूर्व थे| चुनावों में आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित सफलता इस बात का सबूत है कि राजनीति में एक नया एजेंडा साकार हो गया है जिसने ना सिर्फ 15 साल से सत्ता भोग रही कांग्रेस को हाशिये पर ला दिया है बल्कि भाजपा को भी सत्ता से दूर कर दिया है| दिल्ली में उभरे त्रिशंकु समीकरण के बीच ‘आप’ और भाजपा दोनों ने ही सरकार बनाने से इनकार कर दिया है| अगर दिल्ली में दोबारा चुनाव होते हैं तो किस दल को स्पष्ट बहुमत मिलेगा अथवा मिलेगा भी या नहीं – इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, क्यूंकि जिस बदलाव के बीच आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें पाई हैं, भाजपा ने भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में 32 सीटें जीती हैं| दोबारा यदि चुनाव होते भी हैं तो उनमे 4-6 महीनों का समय रहेगा और तब तक समीकरण ऐसे ही बने रहेंगे ये सोचना मूर्खता होगी| इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने कई दफे अपनी तिकड़म या कुशलता के बूते फर्श से अर्श पर वापसी की है| इन 6 महीनों में भी अगर कांग्रेस अपना संगठन फिर व्यवस्थित करने में कामयाब होती है तो कईयों के समीकरण को पलीता लग सकता है|

मध्य प्रदेश के नतीजे अपेक्षा के अनुरूप ही थे मगर इतनी सीटें मिलने का अनुमान कईयों को नहीं था| कई वरिष्ठ पत्रकार इस विराट जीत का श्रेय कांग्रेस की आतंरिक कलह और नेताओं में आपसी सामंजस्य के आभाव को दे रहे हैं| उनकी एक स्वर-एक राग में आई प्रतिक्रिया इस बात की तस्दीक करती है कि आज की पत्रकारिता धरातल से दूर हो चली है| इसमें कोई दो राय नहीं है कि मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है मगर उस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये शिवराज सिंह की व्यकिगत प्रतिबद्धता भी प्रदेश में जाहिर थी| प्रदेश में लोग आज भी दिग्विजय सिंह के कुशासन को नहीं भूले हैं और जब वो उस काल की तुलना आज से करते हैं तो शिवराज सिंह को बेहतर पाते हैं| यही कारण है कि वहाँ का मतदाता कांग्रेस को वोट देने से बचता है और इसका फायदा भी शिवराज सरकार को इस अप्रत्याशित सफलता के रूप में मिला है| इन चुनावों में जीत शिवराज सिंह के नाम पर आई है इसलिए आगामी कार्यकाल शिवराज और मध्य प्रदेश दोनों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होगा| जनता ने उन्हें एक प्रभावी और अत्यंत सुविधाजनक जनादेश दिया है इसलिए वह ये भी देखना चाहेगी कि शिवराज भ्रष्टाचार के मुद्दे- चाहे सरकारी महकमे में हों या अपने ही मंत्रियों पर अनियमितता के आरोप, को कैसे हल करते हैं!

छत्तीसगढ़ में भले ही भाजपा और रमन सिंह तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गए हों पर वहाँ का जनादेश एक चिंता का विषय हैं| कई सीटों पर जहाँ जीत का अंतर बहुत मामूली था वही भाजपा और कांग्रेस के मत प्रतिशत लगभग बराबर हैं| वहाँ की खाद्य सुरक्षा योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने सरकार बचाने में अहम भूमिका अदा की| रमन सिंह की व्यतिगत छवि तो उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाती है पर उनके करीबियों का भ्रष्टाचार चरम पर होने से जनमानस में असंतोष का विषय भी है| और इसलिए मेरी समझ में छत्तीसगढ़ का जनादेश भाजपा के लिये हर्ष से ज्यादा चिंता का संकेत है|

राजस्थान में भाजपा की जीत तो तय थी मगर कांग्रेस यूँ बे-आबरू होकर सत्ता से बेदखल होगी इसकी उम्मीद खुद वसुंधरा ने नहीं की होगी| सस्ता खाना और मुफ्त दवा भी कांग्रेस को रेगिस्तान में वनवास से नहीं बचा पायी| वहाँ की जनता ने वसुंधरा राजे को जिताकर वक्त पर दाँव खेला है| ये दाँव रंग लाता है या वसुंधरा फिर कांग्रेस को मौका देती हैं ये 2018 के चुनावों में स्पष्ट होगा|

8 दिसम्बर से गलियारों में चर्चा गर्म है कि राजनीति में बदलाव की नयी धारा का उद्गम हो गया है| लेकिन मुझे लगता है कि अभी कोई निष्कर्ष ट्रेलर पर फिल्म का रिव्यू लिखने से ज्यादा कुछ नहीं होगा| कहने को 1977 और 1989 में भी जनता जागी थी परन्तु उस जगहर की मियाद कितनी थी सब जानते हैं| जो आज जागा है कल सोएगा भी – ये एक व्यावहारिक सत्य है| सोना-जागना; जागना-सोना सहज प्रक्रिया के अंग हैं| हाँ, एक राजनीतिक विकल्प जरूर मिला है पर देश में पहले भी 1100 विकल्प आकार ले चुके हैं और सभी जन्म के वक्त बदलाव और सुचिता के ही वाहक थे| जेपी- लोहिया के आन्दोलन से जन्मे समाजवादी नेता आगे चलकर देश में भ्रष्टाचार की मिसाल बन गए| इतिहास गवाह है कि हर नदी मुहाने तक नहीं पहुँचती और आम आदमी पार्टी ने तो किसी दूसरी नदी से ना मिलने की कसम खायी है| ऐसे में अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ये तो वक्त ही बताएगा मगर आशा है जो भी होगा शुभ होगा- देश के लिये| इस बीच आत्ममंथन की कवायद भी जारी है|