सरकार ने सड़कों का
जो बिछाया जाल यही है|
फोरलेनी फाइलों में
दौड़ता सरपट कमाल यही है||
दंगों में कल कुछ
औरतों के लूट लिये शौहर|
फिर नामे विधवा
पेंशन दिया माल यही है||
अरसा हुआ सूबे में
जब दबंगों का राज था|
हुक्मरां जब उतरे
गुंडई में वो साल यही है||
कहते है कुछ खादी तो
कुछ गाँधी कोई ड्रामा|
बचने को कानूनी नज़र
से सफ़ेद ढाल यही है||
क्या ठोकरें ही हैं
मेरी जिंदगी का फलसफा|
हर दर पे हूँ जो
पूंछता वो सवाल यही है||