बच्चों के बचपन की नाव
खड़ी मझधारे में...
सड़क किनारे ढाबों में,
बर्तन के संग सपने धोता|
बाल दिवस के मौके जो,
आजादी का बोझ है ढोता|
जग तिलिस्म का सिरा खोजता
इस अंधियारे में...
खेल-खिलौने की बेला में,
संग पिता खेतों को जाता|
बस्ते कंधे रखने की,
उम्र में घर का बोझ उठाता|
कई पीढियां उलझी झुलसी
मिट्टी-गारे में...|
(विश्व बाल श्रम निरोधक दिवस-१२ जून पर विशेष)