April 11, 2012

ग़ालिब तेरे शहर में अब वो बात नहीं है

अब लगभग दिल्ली को देखते समझते ४ साल हो गए हैं| शहर पहले से बहुत बदल गया है -लोगों ने ठहरना बंद कर दिया है|  ये वही भागता हुआ शहर जहाँ कभी ग़ालिब की नज्में सुकून की आहट देती थीं| यहाँ की ९५ फीसदी आबादी के बारे में मैंने कुछ यूँ लिखा है -


ग़ालिब तेरे शहर में अब वो बात नहीं है,
आठों पहर है दिन कोई रात नहीं है|
कहने को साथ-साथ हैं एक छत के साये में,
कब बात की थी आखिरी कुछ याद नहीं है|
पत्थर तो हमेशा से बेदर्द रहे हैं,
यहाँ तो दिलों में भी दिल वाली बात नहीं है|
था वक्त एक जब गम में लोग साथ होते थे,
आज जश्न में भी अपनों का साथ नहीं है|
अब तो पर्दों में तक्सीम है ये ज़माना,
सरेशाम नुक्कडी जमघट का कोई रिवाज़ नहीं है|